आरती सनातन धर्म की एक अत्यंत भावपूर्ण साधना है। यह केवल दीप घुमाने की क्रिया नहीं, बल्कि प्रकाश, भक्ति और समर्पण का संस्कार है—जिससे साधक अपने मन, इंद्रियों और कर्मों को ईश्वर को अर्पित करता है।
शास्त्र आरती के बारे में क्या कहते हैं?
आरती का उल्लेख कई पुराणों और भक्ति-ग्रंथों में मिलता है—विशेषकर स्कंद पुराण, अग्नि पुराण और भागवत पुराण में।
इन ग्रंथों में दीप-पूजन और आरती को ईश्वर-सान्निध्य का साधन बताया गया है।
आरती के प्रमुख उद्देश्य
अज्ञान से ज्ञान की ओर
दीप का प्रकाश अज्ञान के अंधकार को हटाने और ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक है।
आरती करते समय साधक यह भाव रखता है कि— “हे प्रभु! मेरे भीतर का अंधकार दूर हो।”
इंद्रियों का शुद्धिकरण
आरती में पाँच तत्व (पंचोपचार) निहित होते हैं:
- दीप (अग्नि) – दृष्टि
- घंटी (नाद) – श्रवण
- धूप – गंध
- पुष्प – स्पर्श/भाव
- प्रसाद – रस
इससे पाँचों इंद्रियाँ ईश्वर-स्मरण में लगती हैं।
ईश्वर का स्वागत और सम्मान
जैसे अतिथि के स्वागत में दीप जलाया जाता है, वैसे ही आरती ईश्वर के प्रति आदर, कृतज्ञता और प्रेम की अभिव्यक्ति है।
नकारात्मक ऊर्जा का शमन
दीपक की लौ और मंत्र-ध्वनि वातावरण को शुद्ध करती है।
इसी कारण आरती—
- मानसिक तनाव घटाती है
- वातावरण को सात्त्विक बनाती है
- सामूहिक शांति उत्पन्न करती है
समर्पण का भाव
आरती में दीप घुमाते समय साधक यह भाव करता है— “मेरे कर्म, मन और जीवन—सब आपको समर्पित हैं।” यही भक्ति-योग का सार है।
मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक दृष्टि
- लौ पर दृष्टि टिकाने से एकाग्रता बढ़ती है
- घंटी की ध्वनि मस्तिष्क को अल्फा अवस्था में लाती है
- सामूहिक आरती से भावनात्मक जुड़ाव और सकारात्मकता बढ़ती है
आरती क्यों अंत में की जाती है?
पूजा के अंत में आरती इसलिए होती है ताकि—
- पूजा की ऊर्जा स्थिर और पूर्ण हो
- भक्त उस ऊर्जा को अपने भीतर ग्रहण करे
- पूजा का समापन आनंद और कृतज्ञता के साथ हो
निष्कर्ष
✔ आरती कोई औपचारिक रस्म नहीं
✔ यह प्रकाश-ध्यान + भाव-समर्पण है
✔ यह मन, वातावरण और चेतना—तीनों को शुद्ध करती है
आरती = जब भक्ति प्रकाश बन जाती है।


