सनातन धर्म में मूर्ति-पूजा केवल परंपरा नहीं, बल्कि गहरे दार्शनिक और शास्त्रीय आधार पर आधारित साधना-पद्धति है। शास्त्र बताते हैं कि यह मन, इंद्रियों और बुद्धि—तीनों को ईश्वर-स्मरण में स्थिर करने का प्रभावी माध्यम है।
शास्त्र क्या कहते हैं?
ईश्वर निराकार भी हैं, साकार भी
उपनिषद बताते हैं कि परमात्मा निराकार (ब्रह्म) हैं, परंतु करुणा से साकार रूप भी धारण करते हैं ताकि साधक उन्हें समझ और अनुभव कर सके।
“सगुणोऽपि निराकारो निर्गुणोऽपि साकारः” — ईश्वर सगुण-निराकार और निर्गुण-साकार—दोनों हैं।
गीता में साकार उपासना की मान्यता
- भगवद्गीता (अध्याय 12) में श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि— निर्गुण उपासना कठिन है
- साकार (मूर्ति-आधारित) उपासना सामान्य मनुष्य के लिए सरल
“क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्”
मूर्ति ईश्वर नहीं, ईश्वर का प्रतीक है
मूर्ति पत्थर या धातु नहीं—ईश्वर-तत्व का प्रतीक है। जैसे— तिरंगा कपड़ा नहीं, राष्ट्र का सम्मान फोटो कागज़ नहीं, स्मृति का माध्यम वैसे ही मूर्ति—एकाग्रता का केंद्र।
पुराणों में मूर्ति-पूजा का विधान
विष्णु पुराण, शिव पुराण, भागवत पुराण में मूर्ति-पूजा, प्राण-प्रतिष्ठा और विधिवत उपासना का विस्तार से वर्णन है।
आदि शंकराचार्य का दृष्टिकोण
आदि शंकराचार्य (अद्वैत वेदांत) स्वयं कहते हैं— “चित्तशुद्ध्यर्थं मूर्तिपूजा आवश्यक है।”
अर्थात, मन की शुद्धि और ध्यान-स्थिरता के लिए मूर्ति-पूजा आवश्यक है।
मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारण
- मानव मन दृश्य पर जल्दी केंद्रित होता है
- मूर्ति से भाव, भक्ति और अनुशासन विकसित होता है
- जप-ध्यान में विचलन कम होता है
- साधक का अहंकार गलता है
निष्कर्ष
✔ मूर्ति-पूजा अंधविश्वास नहीं
✔ यह निर्गुण तक पहुँचने का सगुण माध्यम है
✔ शास्त्र, संत और दर्शन—तीनों इसे स्वीकारते हैं
“मूर्ति साधन है, साध्य नहीं।” साध्य है—ईश्वर-अनुभूति।


